रोजगार

हाईकोर्ट ने एमपी की सरकारी नौकरियों में 14% ओबीसी कोटा बहाल किया, रोके गए पद भरने का आदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत करने वाले 2019 के कानून को रद्द कर लोक सेवाओं में कोटा 14 प्रतिशत कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार भर्ती एजेंसियों को रोके गए पद तीन महीने में भरने होंगे।

लेखक विंध्य सत्ता डेस्क
हाईकोर्ट ने एमपी की सरकारी नौकरियों में 14% ओबीसी कोटा बहाल किया, रोके गए पद भरने का आदेश
File photo of the Madhya Pradesh High Court, Jabalpur. Photo: Gyanendra_Singh_Chau…, CC BY 3.0, via Wikimedia Commons
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 2019 के उस संशोधन को रद्द कर दिया है, जिसने राज्य की लोक सेवाओं और उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था। यह फैसला राज्य की सरकारी भर्तियों को सीधे प्रभावित करता है। दी ट्रिब्यून और दैनिक जागरण के अंग्रेज़ी संस्करण के अनुसार जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को जबलपुर में यह निर्णय सुनाया। दी ट्रिब्यून ने इसे 159 पृष्ठ का आदेश बताया।

दी ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक खंडपीठ ने माना कि इस बढ़ोतरी से कुल आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50 प्रतिशत की सीमा से आगे चला गया, और इसे उचित ठहराने लायक कोई असाधारण परिस्थिति साबित नहीं हुई। साथ ही यह भी पाया कि संशोधन जल्दबाज़ी में पारित हुआ और उसमें मसौदे संबंधी त्रुटियाँ थीं। दैनिक जागरण के अनुसार अदालत ने उच्च शिक्षा में ओबीसी नामांकन 33.87 प्रतिशत और सरकारी नौकरियों में 28.16 प्रतिशत दर्शाने वाले आंकड़ों का सहारा लिया। दोनों अखबारों ने बताया कि खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि मामला आरक्षण की मात्रा का था, ओबीसी के आरक्षण पाने के अधिकार का नहीं।

सबसे तत्काल असर भर्तियों पर पड़ता है। दोनों रिपोर्टों के अनुसार मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन मंडल समेत भर्ती एजेंसियों को मुकदमे के दौरान 87:13 की व्यवस्था के तहत रोके गए 13 प्रतिशत पदों को तीन महीने के भीतर भरना होगा। रिपोर्टों के मुताबिक ये पद अनारक्षित वर्ग से भरे जाएंगे।

दी ट्रिब्यून ने बताया कि मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच नियुक्त ओबीसी उम्मीदवार अपनी नौकरी पर बने रहेंगे, और 14 प्रतिशत से अधिक पदों का समायोजन अगली तीन भर्तियों में किया जाएगा। 29 सितंबर 2022 के बाद की नियुक्तियों में, जो 87 प्रतिशत पदों तक सीमित थीं, शेष 13 प्रतिशत अब अनारक्षित वर्ग को जाने होंगे। दैनिक जागरण का कहना है कि आदेश में 2022 के बाद की नियुक्तियों के लिए निर्देश हैं, पर उनका विवरण नहीं दिया गया।

दी ट्रिब्यून के अनुसार यह बढ़ोतरी मार्च 2019 में कमलनाथ की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार के अध्यादेश से लाई गई थी और बाद में कानून बनाई गई। हाईकोर्ट में चुनौती के बाद सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित याचिकाएं संयुक्त सुनवाई के लिए लौटा दी थीं। अंतिम सुनवाई 5 अगस्त 2026 को पूरी हुई, जब खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा।

दी ट्रिब्यून ने प्रतिक्रियाएं भी दीं। एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह ने कहा कि अदालत ने दस्तावेज़ों और आंकड़ों की जाँच के बाद फैसला दिया, और विवाद ओबीसी कोटे का नहीं, आरक्षण में बढ़ोतरी का था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि पार्टी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। याचिकाकर्ता और ओबीसी महासभा के सदस्य लोकेंद्र गुर्जर ने कहा कि संगठन अपील करेगा और प्रदेशव्यापी आंदोलन चलाएगा। चूँकि अपील संभव है, इसलिए अभ्यर्थियों को भर्ती एजेंसियों की सूचनाओं पर नज़र रखने की सलाह है।

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