सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की दोषसिद्धि घटाने वाले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश पर नोटिस जारी किया
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की दोषसिद्धि को घटाने पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की आलोचना करते हुए नोटिस जारी किया और पूछा कि विचारण अदालत का फैसला बहाल क्यों न किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक हत्या के मामले में नोटिस जारी किया है और हाईकोर्ट द्वारा अपील को संभालने के तरीके की कड़ी आलोचना की है, जिसने सजा हत्या से घटाकर हत्या की कोशिश से कम गंभीर अपराध में बदल दी थी। बार एंड बेंच और ईटीवी भारत के अनुसार जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को मामले की सुनवाई की।
यह मामला फरवरी 2021 में एक महिला की मौत से जुड़ा है। रिपोर्टों में घटना के कुछ ब्योरों पर अंतर है, पर दोनों का कहना है कि पोस्टमार्टम में मौत का कारण सिर की चोट बताया गया और मरने से पहले महिला ने अपने पति से कहा था कि अभियुक्त ने उस पर हमला किया। सितंबर 2022 में विचारण अदालत ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी पाकर आजीवन कारावास की सजा दी थी।
बार एंड बेंच के अनुसार नवंबर 2024 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की एक पीठ ने दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 304 भाग II में बदलकर दस वर्ष की सजा दी। ईटीवी भारत के मुताबिक हाईकोर्ट ने कोई साबित उद्देश्य या पूर्व नियोजन नहीं पाया और माना कि अचानक झगड़ा और आवेश के कारण मामला हत्या की परिभाषा के अपवाद में आता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस चरण पर इस दृष्टिकोण को नहीं माना। बार एंड बेंच द्वारा उद्धृत उसके आदेश में कहा गया कि हाईकोर्ट ने चोटों की प्रकृति, इस्तेमाल हुए हथियारों और घटना की उत्पत्ति को अनदेखा किया प्रतीत होता है। पीठ ने अभियुक्त और छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी कर पूछा कि हाईकोर्ट का आदेश क्यों न रद्द किया जाए और विचारण अदालत की हत्या की दोषसिद्धि बहाल क्यों न की जाए। उसने कहा कि वह मामले पर उसके गुण-दोष के आधार पर फिर से विचार करेगी।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने मौखिक टिप्पणियां कीं, जिनकी चर्चा हुई। बार एंड बेंच और ईटीवी भारत के अनुसार जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि हाईकोर्ट की परिस्थिति देखी जानी चाहिए, और यह भी कहा कि धारा 304 के दो भागों का अंतर वह सिद्धांत है जो लॉ स्कूलों में पहले वर्ष में पढ़ाए जाते हैं। ईटीवी भारत ने जोड़ा कि पीठ ने हाईकोर्ट के तरीके को लापरवाह और कानून की समझ के बिना बताया। ये सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां हैं, अंतिम फैसले के निष्कर्ष नहीं।
ईटीवी भारत के अनुसार अभियुक्त की ओर से विधिक सहायता वकील पेश हुए, जिन्होंने तर्क दिया कि दोषसिद्धि का कोई साक्ष्य आधार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी अपील पर फैसला नहीं दिया है। नोटिस जारी करना एक प्रक्रियात्मक कदम है जो दूसरे पक्ष को जवाब देने का अवसर देता है, और शीर्ष अदालत के फैसले तक विचारण अदालत की दोषसिद्धि और हाईकोर्ट द्वारा उसे घटाना, दोनों रिकॉर्ड पर रहते हैं।



