सुप्रीम कोर्ट: कारण हो तो पीएमएलए गिरफ्तारी के कागज़ात भेजने में देरी घातक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवश्यक कारण हो तो धन शोधन कानून के तहत गिरफ्तारी के कागज़ात भेजने में देरी से गिरफ्तारी अवैध नहीं होती। अदालत ने लंबी हिरासत के आधार पर अपीलकर्ता को जमानत दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी का आदेश और सहायक सामग्री निर्णायक प्राधिकरण को भेजने में देरी अपने आप में गिरफ्तारी को अवैध नहीं बनाती, यदि देरी का आवश्यक कारण हो। लाइवलॉ और ईटीवी भारत के अनुसार जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 14 अक्टूबर 2026 को एक उद्योगपति को जमानत देते हुए यह फैसला सुनाया।
अपीलकर्ता संजय सुरेखा, जिन्हें ईटीवी भारत कॉन्कास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड का मालिक बताता है, ने धन शोधन के एक मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने से इन्कार को चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी गिरफ्तारी अवैध थी, क्योंकि गिरफ्तारी का आदेश और आधार सामग्री हिरासत में लेने के पांच दिन बाद निर्णायक प्राधिकरण को मिली। उनका तर्क था कि अधिनियम की धारा 19(2), जो कहती है कि सामग्री तत्काल भेजी जाए, समान समय पर भेजने की मांग करती है।
पीठ ने इस तर्क को नहीं माना। रिपोर्टों के अनुसार उसने कहा कि अधिनियम में कोई तय समयसीमा नहीं है और तत्काल का अर्थ है कि सामग्री शीघ्र और बिना अनुचित विलंब के भेजी जाए, जरूरी नहीं कि 24 घंटे के भीतर। लाइवलॉ के अनुसार अदालत ने कहा कि आदर्श रूप से भेजना गिरफ्तारी के साथ ही होना चाहिए, पर वैध कारण से हुई देरी प्रावधान का उल्लंघन नहीं है।
लाइवलॉ के अनुसार अदालत ने मूल सुरक्षाओं को भी देखा और उन्हें पूरा पाया। गिरफ्तार करने वाले अधिकारी के पास सामग्री थी, उसने लिखित कारण दर्ज किए, गिरफ्तारी के आधार बताए और अपीलकर्ता को 24 घंटे के भीतर सक्षम अदालत में पेश किया। इस आधार पर पांच दिन की देरी से गिरफ्तारी अमान्य नहीं हुई। ईटीवी भारत के अनुसार पीठ ने जोर दिया कि कोई भी देरी केवल उतनी ही होनी चाहिए जितनी नितांत आवश्यक हो।
फिर भी अदालत ने लंबी हिरासत के आधार पर जमानत दी। रिपोर्टों के अनुसार अपीलकर्ता 20 महीने से अधिक समय से जेल में था, अपराध में अधिकतम सात वर्ष की सजा है, उसके विरुद्ध जांच पूरी हो चुकी है और विचारण लंबा चलने की संभावना है। लाइवलॉ के अनुसार पीठ ने 2024 के मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय के फैसले का हवाला दिया और कहा कि अब आरोपी को सलाखों के पीछे रखने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। जमानत विचारण अदालत के संतोष के अनुरूप बॉन्ड और अन्य शर्तों के अधीन है।
यह फैसला यह तय नहीं करता कि अपीलकर्ता पर लगे आरोप सच हैं या नहीं। वे विचारण में देखे जाने बाकी हैं और दोष सिद्ध होने तक अपीलकर्ता निर्दोष माना जाता है।



