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बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भारत की दो डेब्यू फिल्मों ने जीते पुरस्कार

शशांक वालिया की ‘बर्ड्स इन द डार्क’ और सैलेश रत्नकुमार की ‘सेल्वी’, दोनों पहली फीचर फिल्में, ने दक्षिण कोरिया के बुसान महोत्सव के विज़न-एशिया खंड में पुरस्कार जीते हैं।

लेखक विंध्य सत्ता डेस्क
बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भारत की दो डेब्यू फिल्मों ने जीते पुरस्कार
Photo: 399scout, CC BY-SA 4.0, via Wikimedia Commons (file photo of the Busan Cinema Center, a festival venue; not from the 2026 edition)
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आउटलुक इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण कोरिया के 31वें बुसान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भारत की दो डेब्यू फिल्मों ने पुरस्कार जीते हैं। शशांक वालिया की ‘बर्ड्स इन द डार्क’ और तमिल निर्माता-निर्देशक सैलेश रत्नकुमार की पहली फीचर फिल्म ‘सेल्वी’ महोत्सव के विज़न-एशिया खंड में शामिल केवल दो भारतीय निर्माण थीं और दोनों पुरस्कार लेकर लौटीं।

आउटलुक के अनुसार ‘बर्ड्स इन द डार्क’, जिसका पंजाबी शीर्षक ‘हनेरे दे पंछी’ बताया गया है, ने एशिया के लिए सॉन्गवॉन विज़न ऑडियंस अवार्ड जीता, जिसमें दस लाख कोरियाई वोन की नकद राशि है। वालिया ने फिल्म लिखी, शूट की और निर्देशित की है। यह ट्रू स्टोरी फिल्म्स की प्रस्तुति है और रीमा कालर, हंसल मेहता और साहिल सैगल इसके निर्माताओं में शामिल हैं। यह पुरस्कार ज्यूरी के बजाय दर्शकों की प्रतिक्रिया से तय होता है।

आउटलुक ने जीत पर वालिया के हवाले से लिखा, “यह पुरस्कार उनका है”, जो पंजाब के पांच गांवों के उन लोगों के लिए कहा गया, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने फिल्म बनाने में मदद की। उसी रिपोर्ट के अनुसार मेहता ने कहा कि दर्शकों की प्रतिक्रिया दिखाती है कि इस तरह का सिनेमा उम्मीद दे सकता है। इनमें से किसी भी टिप्पणी में कहानी का वर्णन नहीं था, और रिपोर्ट में ‘बर्ड्स इन द डार्क’ की कहानी का खाका नहीं दिया गया था।

‘सेल्वी’ का प्रीमियर विज़न-एशिया खंड में हुआ और उसने दो पुरस्कार जीते — हाइलाइफ विज़न अवार्ड और ताइपेइ फिल्म कमीशन अवार्ड, आउटलुक के अनुसार। अंजलि पाटिल इसमें शीर्षक भूमिका निभाती हैं और अनाहत फिल्म्स के जरिए इसकी निर्माता भी हैं। जापान स्थित आलोचक फिलिप ब्रासोर, जिन्होंने बुसान में फिल्म देखी, अपनी महोत्सव डायरी में इसे वर्ल्ड प्रीमियर बताते हैं और लिखते हैं कि मुख्य किरदार मुंबई की एक केयरगिवर है, जो सिंगापुर में लाइसेंस के लिए पढ़ाई कर रही है और परिवार का खर्च उठाती है; कहानी उसकी एक अविश्वसनीय बचपन की सहेली पर केंद्रित है।

बुसान में एशियन कॉन्टेंट्स एंड फिल्म मार्केट भी आयोजित होता है, जहां विकासाधीन परियोजनाओं की प्रस्तुति और वित्तपोषण होता है। वन मैन्स मूवीज़ के 14 अक्तूबर के एक फिल्म-समाचार सारांश के अनुसार त्रिबेणी राय की फिल्म, जिसे ‘ए क्रॉनिकल ऑफ माइनर थिंग्स’ के कार्यकारी शीर्षक से सूचीबद्ध किया गया है, ने 15,000 डॉलर के नकद पुरस्कार वाला शीर्ष एपीएम बुसान अवार्ड और नॉर्वेजियन सोरफॉन्ड अवार्ड जीता। यह रिपोर्ट एक द्वितीयक सारांश है और जिन पुरस्कारों का उसमें वर्णन है, वे महोत्सव प्रतियोगिता से अलग थे।

स्वतंत्र भारतीय फिल्मकारों के लिए विदेशी महोत्सव में मिली मान्यता कलात्मक के साथ-साथ व्यावसायिक रूप से भी मायने रख सकती है, क्योंकि इससे छोटी फिल्मों को वितरक और व्यापक दर्शक मिल सकते हैं। ‘बर्ड्स इन द डार्क’ या ‘सेल्वी’ भारत के सिनेमाघरों या स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म पर कब आएंगी, यह अभी घोषित नहीं हुआ है और मध्यप्रदेश समेत अन्य राज्यों के दर्शकों को निर्माताओं से आगे की जानकारी का इंतज़ार करना पड़ सकता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस लेख की जानकारी मुख्य तौर पर एक प्रमुख रिपोर्ट से आई है, जिसे एक आलोचक की महोत्सव डायरी और एक समाचार सारांश से पूरा किया गया है। विज़न-एशिया विजेताओं की महोत्सव की अपनी आधिकारिक घोषणा इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं थी, इसलिए पुरस्कारों के नाम और राशि को उन्हीं माध्यमों के अनुसार पढ़ा जाना चाहिए।

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